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Mujhse shero ka ye byopaar nahi ho sakta Ajay Sahaab

Mujhse shero ka ye byopaar nahi ho sakta Ajay Sahaab

मुझसे शेरों का ये ब्योपार नहीं हो सकता
मैं कभी दुश्मने मेयार[1] नहीं हो सकता

इसमें ख़बरें हैं मुहब्बत की ,रफ़ाक़त[2] की हुज़ूर !
ये मेरे मुल्क का अखबार नहीं हो सकता

कितनी दौलत है अंधेरों का मुलाज़िम बनकर
पर मैं ज़ुल्मत[3] का तरफ़दार नहीं हो सकता

मुझको इनआम या अलक़ाब[4] मिलें तो कैसे
मैं कभी खादिमे दरबार[5] नहीं हो सकता

अपनी आँखों के ही आंसू नज़र आएं जिसको
चाहे कुछ भी हो वो फ़नकार नहीं हो सकता

मेरे नग़मे में हैं इंसान की आहें लोगो
ये तो पाज़ेब की झंकार नहीं हो सकता

तूने मज़लूम[6] की, मुफ़लिस की मदद की ही नहीं
तू कभी साहिबे किरदार[7] नहीं हो सकता

छाओं भी बाँटी है फ़िरक़ों में सियासत की तरह
तू कभी साया ए अशजार[8] नहीं हो सकता

सच तो सबको है पता पर कोई कहता है कहाँ
सच कभी शामिले गुफ़्तार[9] नहीं हो सकता

तल्ख़[10] बातों को बयां करता है शेरों में ‘सहाब’
वो ज़माने सा रियाकार[11] नहीं हो सकताशब्दार्थ

  1.  गुणवत्ता का दुश्मन
  2.  मित्रता
  3.  अँधेरा
  4.  उपाधियाँ
  5.  दरबार का,सत्ता का सेवक
  6.  पीड़ित
  7.  चरित्रवान
  8.  पेड़ों की छाया
  9.  बात चीत का हिस्सा
  10.  कड़वा
  11.  मक्कार
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shajarekhwab

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