Celebrating Great Writing

Category: Ramdhari Singh Dinkar

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,आदमी भी क्या अनोखा जीव है!उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है। जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरतेऔर लाखों…

धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला…

प्रिय की पृथुल जाँघ पर लेटी करती थीं जो रंगरलियाँ,उनकी कब्रों पर खिलती हैं नन्हीं जूही की कलियाँ। पी न सका कोई जिनके नव अधरों की मधुमय प्याली,वे भौरों से रूठ झूमतीं बन कर चम्पा की डाली। तनिक चूमने से…

पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,झरती रस की धारा अखण्ड,मेंहदी जब सहती है प्रहार,बनती ललनाओं का सिंगारजब फूल पिरोये जाते हैं,हम उनको गले लगाते हैं। वसुधा का नेता कौन हुआ?भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?जिसने न कभी आराम…

स्वातन्त्रय जाति की लगन व्यक्ति की धुन है,बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है !वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रेजो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे! जब कभी अहम पर नियति चोट देती है,कुछ चीज़ अहम से…

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