Celebrating Great Writing

Category: Habib Jalib

झूटी ख़बरें घड़ने वाले झूटे शे’र सुनाने वाले लोगो सब्र कि अपने किए की जल्द सज़ा हैं पाने वाले दर्द आँखों से बहता है और चेहरा सब कुछ कहता है ये मत लिक्खो वो मत लिक्खो आए बड़े समझाने वाले…

शेर से शाइरी से डरते हैं कम-नज़र रौशनी से डरते हैं लोग डरते हैं दुश्मनी से तिरी हम तिरी दोस्ती से डरते हैं दहर में आह-ए-बे-कसाँ के सिवा और हम कब किसी से डरते हैं हम को ग़ैरों से डर…

शे’र होता है अब महीनों मेंज़िन्दगी ढल गई मशीनों में प्यार की रौशनी नहीं मिलतीउन मकानों में उन मकीनों में देखकर दोस्ती का हाथ बढ़ाओसाँप होते हैं आस्तीनों में क़हर की आँख से न देख इन कोदिल धड़कते हैं आबगीनों…

कहाँ क़ातिल बदलते हैं फ़क़त चेहरे बदलते हैंअजब अपना सफ़र है फ़ासले भी साथ चलते हैं बहुत कमजर्फ़ था जो महफ़िलों को कर गया वीराँन पूछो हाले चाराँ शाम को जब साए ढलते हैं वो जिसकी रोशनी कच्चे घरों तक…

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था…

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