Celebrating Great Writing

Category: Ghazal

यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैंमिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वालेदर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखोराज़ दिल…

ये न थी हमारी क़िस्मत, के विसाल-ए-यार होताअगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता तेरे वादे पे जिए हम, तो ये जान झूट जानाके ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता तेरी नाज़ुकी से जाना के बंधा है एहद-ए-बूदाकभी…

इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैंआने वाले बरसों ब’अद भी आते हैं हम ने जिस रस्ते पर उस को छोड़ा हैफूल अभी तक उस पर खिलते जाते हैं दिन में किरनें आँख-मिचोली खेलती हैंरात गए कुछ जुगनू मिलने जाते…

जिस्म पर बाक़ी ये सर है क्या करूँदस्त-ए-क़ातिल बे-हुनर है क्या करूँ (दस्त-ए-क़ातिल = क़ातिल का हाथ) चाहता हूँ फूँक दूँ इस शहर कोशहर में इन का भी घर है क्या करूँ वो तो सौ सौ मर्तबा चाहें मुझेमेरी चाहत…

बेबसी जुर्म है हौसला जुर्म हैज़िंदगी तेरी इक-इक अदा जुर्म है ऐ सनम तेरे बारे में कुछ सोचकरअपने बारे में कुछ सोचना जुर्म है याद रखना तुझे मेरा इक जुर्म थाभूल जाना तुझे दूसरा जुर्म है क्या सितम है के…

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौलाचिड़ियों को दाना, बच्चों को गुड़धानी दे मौला दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता हैसोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई…

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलेंजिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसादोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें (हिजाबों = पर्दों) ढूँढ उजड़े हुए लोगों…

चांद का ख्वाब उजालों की नज़र लगता हैतू जिधर हो के गुज़र जाए खबर लगता है। उस की यादों ने उगा रखे हैं सूरज इतनेशाम का वक्त भी आए तो सहर लगता है एक मंज़र पे ठहरने नहीं देती फ़ितरतउम्र…

जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकारवो शख्स मुझ को बहुत बदनसीब लगता है हदूद-ए-जात से बाहर निकल के देख ज़राना कोई गैर, ना कोई रक़ीब लगता है ये दोस्ती, ये मरासिम, ये चाहते ये खुलूसकभी कभी ये…

मंज़िल पे न पहुंचे उसे रस्ता नहीं कहतेदो-चार कदम चलने को चलना नहीं कहते एक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपनाएक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते कम हिम्मती, ख़तरा है समंदर के…

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