Celebrating Great Writing

Thokre kha ke sambhal na nahi aata hai mujhe Farhat Ehsas

Thokre kha ke sambhal na nahi aata hai mujhe Farhat Ehsas

अब तिरी गर्मी-ए-आग़ोश ही तदबीर करे

मोम हो कर भी पिघलना नहीं आता है मुझे

शाम कर देता है अक्सर कोई ज़ुल्फ़ों वाला

वर्ना वो दिन हूँ कि ढलना नहीं आता है मुझे

कितने दिल तोड़ चुका हूँ इसी बे-हुनरी से

जाल में फँस के निकलना नहीं आता है मुझे

बीच दरिया के मैं दरिया तो बदल सकता हूँ

अपनी कश्ती को बदलना नहीं आता है मुझे

अपने मा’नी को बदलना तो मुझे आता है

इन के लफ़्ज़ों को बदलना नहीं आता है मुझे

‘फ़रहत-एहसास’ तरक़्क़ी नहीं करनी मुझ को

इतनी रफ़्तार से चलना नहीं आता है मुझे

Please follow and like us:
error

shajarekhwab

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top