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Pura yaha ka hai na mukammal vaha ka hai Rajesh Reddy

पूरा यहाँ का है न मुकम्मल वहाँ का हैये जो मिरा वजूद है जाने कहाँ का है
क़िस्सा ये मुख़्तसर सफ़र-ए-रायगाँ का है हैं कश्तियाँ यक़ीं की समुंदर गुमाँ का है
(मुख़्तसर = थोड़ा, कम, संक्षिप्त), (सफ़र-ए-रायगाँ = व्यर्थ का सफ़र), (गुमाँ = गुमान, घमण्ड, अहँकार)
मौजूद हर जगह है ब-ज़ाहिर कहीं नहींहर सिम्त इक निशान किसी बेनिशाँ का है
धुंधले से कुछ नज़ारे उभरते हैं ख़्वाब में

Pura yaha ka hai na mukammal vaha ka hai Rajesh Reddy

खुलता नहीं है कौन-सा मंज़र कहाँ का है
दीवार-ओ-दर पे सब्ज़ा है और दिल है ज़र्द-ज़र्द

ये मौसम-ए-बहार ही मौसम ख़ज़ाँ का है
(सब्ज़ा = घास), (ख़ज़ाँ = पतझड़)
ह़ैराँ हूंँअपने लब पे तबस्सुम को देखकरकिरदार ये तो और किसी दास्ताँ का है
(तबस्सुम = मुस्कराहट)
दम तोड़ती ज़मीं का है ये आख़िरी बयान

होठों पे उसके नाम किसी आसमाँ का है
जाते हैं जिसमें लोग इबादत के वास्तेसुनते हैं वो मकान किसी ला-मकाँ का है
(ला-मकाँ = ईश्वर, ख़ुदा)
आँसू को मेरे देखके बोली ये बेबसीये लफ़्ज़ तो ह़ुज़ूर हमारी ज़ुबाँ का है
– राजेश रेड्डी

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