Celebrating Great Writing

peshaniyo pe likhe mukaddar nahi mile Rahat Indori

पेशानियों पे लिखे मुक़द्दर नहीं मिले
दस्तार कहाँ मिलेंगे जहाँ सर नहीं मिले





आवारगी को डूबते सूरज से रब्त है
मग़्रिब के बाद हम भी तो घर पर नहीं मिले

कल आईनों का जश्न हुआ था तमाम रात
अन्धे तमाशबीनों को पत्थर नहीं मिले

मैं चाहता था ख़ुद से मुलाक़ात हो मगर
आईने मेरे क़द के बराबर नहीं मिले

परदेस जा रहे हो तो सब देखते चलो
मुमकिन है वापस आओ तो ये घर नहीं मिले

* पेशानी – माथा
* दस्तार – पगड़ी
* रब्त – लगाव
* मग़्रिब – सूर्यास्त का समय

राहत इन्दौरी

peshaniyo pe likhe mukaddar nahi mile Rahat Indori
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shajarekhwab

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