Celebrating Great Writing

मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा किसी…

हिज्र की पहली शाम के साये दूर उफ़क़ तक छाये थे

हिज्र* की पहली शाम के साये दूर उफ़क़* तक छाये थे हम जब उसके शहर से निकले सब रास्ते सँवलाये थे जाने वो क्या सोच रहा था अपने दिल में सारी रात प्यार की बातें करते करते उस के नैन…

किस बाज़ार में मिलता है पता है तुम्हें क्या जो दरख़्तों में रिसता है बरसात का पानी और भर जाता है आँखों में  धीरे धीरे याद बन कर ना छलकता है ना दिखता है बस धीमी धीमी सी साँसे लेता…

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