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kya aaye tum jo aaye ghadi do ghadi ke bad Mohammad Ibrahim Jauk

kya aaye tum jo aaye ghadi do ghadi ke bad Mohammad Ibrahim Jauk

थे दो घड़ी से शैख़ जी शेख़ी बघारते

सारी वो शेख़ी उन की झड़ी दो घड़ी के बाद

कहता रहा कुछ उस से अदू दो घड़ी तलक

ग़म्माज़ ने फिर और जड़ी दो घड़ी के बाद

परवाना गिर्द शम्अ के शब दो घड़ी रहा

फिर देखी उस की ख़ाक पड़ी दो घड़ी के बाद

तू दो घड़ी का वादा न कर देख जल्द आ

आने में होगी देर बड़ी दो घड़ी के बाद

गो दो घड़ी तक उस ने न देखा इधर तो क्या

आख़िर हमीं से आँख लड़ी दो घड़ी के बाद

क्या जाने दो घड़ी वो रहे ‘ज़ौक़’ किस तरह

फिर तो न ठहरे पाँव घड़ी दो घड़ी के बाद

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shajarekhwab

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