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kuchh to hawa bhi sard thi kuchh tha tera KHayal bhi
PARVEEN SHAKIR

kuchh to hawa bhi sard thi kuchh tha tera KHayal bhi
PARVEEN SHAKIR

मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर

हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी

उस की सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं

उस की हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी

गाह क़रीब-ए-शाह-रग गाह बईद-ए-वहम-ओ-ख़्वाब

उस की रफ़ाक़तों में रात हिज्र भी था विसाल भी

उस के ही बाज़ुओं में और उस को ही सोचते रहे

जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी

शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पता

मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी

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shajarekhwab

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