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Housle zindagi ke dekhte hai Dr. Rahat Indori

Housle zindagi ke dekhte hai Dr. Rahat Indori

हौसले ज़िंदगी के देखते हैं

चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं

नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है

ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं

रोज़ हम इक अँधेरी धुँद के पार

क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं

धूप इतनी कराहती क्यूँ है

छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं

टुकटुकी बाँध ली है आँखों ने

रास्ते वापसी के देखते हैं

पानियों से तो प्यास बुझती नहीं

आइए ज़हर पी के देखते हैं

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shajarekhwab

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