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Hath chhute bhi to rishte nahi chhuta karte Gulzar Jagjit Singh

Hath chhute bhi to rishte nahi chhuta karte Gulzar Jagjit Singh

हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते

जिसने पैरों के निशाँ भी नहीं छोड़े पीछे
उस मुसाफ़िर का पता भी नहीं पूछा करते

तूने आवाज़ नहीं दी कभी मुड़कर वरना
हम कई सदियाँ तुझे घूम के देखा करते

बह रही है तेरी जानिब ही ज़मीं पैरों की
थक गये दौड़ते दरियाओं का पीछा करते

(जानिब = ओर, तरफ़)

-गुलज़ार

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shajarekhwab

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