Celebrating Great Writing

Category: Nawaz deobandi

ख़ुद को कितना छोटा करना पड़ता है बेटे से समझौता करना पड़ता है जब औलादें नालायक़ हो जाती हैं अपने ऊपर ग़ुस्सा करना पड़ता है सच्चाई को अपनाना आसान नहीं दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है जब सारे के…

ज़बान वालों से इक बे-ज़बान पूछता है मकीं कहाँ गए ख़ाली मकान पूछता है ख़ुदा यहाँ भी तअ’स्सुब वहाँ भी है कि नहीं कराची वालों से हिन्दोस्तान पूछता है मुझे ये धूप ये बरसात क्यूँ सताती है ये बात मुझ…

सहरा सहरा चीख़ता फिरता हूँ मैं हो के दरिया किस क़दर प्यासा हूँ मैं जान कर गूँगा हूँ और बहरा हूँ मैं इस लिए इस शहर में ज़िंदा हूँ मैं इस को मंज़िल जानते हैं राहबर इत्तीफ़ाक़न जिस जगह ठहरा…

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