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Category: hindi kavita

घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में काँटों पे चले लेकिन होने न दिया ज़ाहिर तलवों का लहू धोया छुप छुप के अकेले में ऐ दावर-ए-महशर ले देख आए तिरी…

सियाने थे मगर इतने नहीं हम ख़मोशी की ज़बाँ समझे नहीं हम अना की बात अब सुनना पड़ेगी वो क्या सोचेगा जो रूठे नहीं हम अधूरी लग रही है जीत उस को उसे हारे हुए लगते नहीं हम हमें तो…

नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता…

सितम के बा’द करम की अदा भी ख़ूब रही जफ़ा तो ख़ैर जफ़ा थी वफ़ा भी ख़ूब रही ब-फ़ैज़-ए-गर्दिश-ए-दौराँ उन्हें भी प्यार आया ब-पास-ए-मस्लहत उन की रज़ा भी ख़ूब रही ब-सद-ख़ुलूस क़नाअ’त की दाद मिलती है गदा-नवाज़ी-ए-अहल-ए-सख़ा भी ख़ूब रही…

तो मैं भी ख़ुश हूँ कोई उस से जा के कह देना अगर वो ख़ुश है मुझे बे-क़रार करते हुए तुम्हें ख़बर ही नहीं है कि कोई टूट गया मोहब्बतों को बहुत पाएदार करते हुए मैं मुस्कुराता हुआ आइने में…

सर-ए-महशर हम ऐसे आसियों का और क्या होगा दर-ए-जन्नत न वा होगा दर-ए-रहमत तो वा होगा जहन्नम हो कि जन्नत जो भी होगा फ़ैसला होगा ये क्या कम है हमारा और उन का सामना होगा अज़ल हो या अबद दोनों…

हर बार हुआ है जो वही तो नहीं होगा डर जिस का सताता है अभी तो नहीं होगा दुनिया को चलो परखें नए दोस्त बनाएँ हर शख़्स ज़माने में वही तो नहीं होगा वो शख़्स बड़ा है तो ग़लत हो…

दिल के दीवार-ओ-दर पे क्या देखा बस तिरा नाम ही लिखा देखा तेरी आँखों में हम ने क्या देखा कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा अपनी सूरत लगी पराई सी जब कभी हम ने आईना देखा हाए अंदाज़ तेरे रुकने का…

एक दिया उस घर जलाएंजहां रहता फौजी रणबांकुरा हो  वो सरहद पर मुस्तैद रहेपर उसके घर हमारा पहरा हो। कुछ दिए अपने हिस्से के जरूरतमंदों को “प्रथमेश” दे आएँउनके घर भी दिवाली का उजियारा हो। एक दिया मेरे मंदिर एक…

दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,व्यर्थ है…

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