दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,व्यर्थ है…