Celebrating Great Writing

Category: Ghulam Ali

कभी आँसू कभी ख़ुशी बेचीहम ग़रीबों ने बेकसी बेची (बेकसी = दुःख, कष्ट, तक़लीफ़, बेबसी, विवशता) चन्द साँसे ख़रीदने के लियेरोज़ थोड़ी सी ज़िन्दगी बेची जब रुलाने लगे मुझे सायेमैंने उकता के रौशनी बेची एक हम थे के बिक गये ख़ुद…

इतना टूटा हूँ के छूने से बिखर जाऊँगाअब अगर और दुआ दोगे तो मर जाऊँगा पूछकर मेरा पता वक्त रायदा न करोमैं तो बंजारा हूँ क्या जाने किधर जाऊँगा हर तरफ़ धुंध है, जुगनू है, न चराग कोईकौन पहचानेगा बस्ती…

अपनी आँखों में छुपा रक्खे हैं जुगनू मैंनेअपनी पलकों पे सजा रक्खे हैं आँसू मैंनेमेरी आँखों को भी बरसात का मौका दे दे आज की रात मेरा दर्द-ए-मोहब्बत सुन लेकँप-कँपाते हुए होठों की शिकायत सुन लेआज इज़हार-ए-ख़यालात का मौका दे…

ऐ हुस्न-ए-बे-परवाह तुझे शबनम कहूँ शोला कहूँफूलों में भी शोख़ी तो है किसको मगर तुझ-सा कहूँ गेसू उड़े महकी फ़िज़ा जादू करें आँखे तेरीसोया हुआ मंज़र कहूँ या जागता सपना कहूँ चंदा की तू है चांदनी लहरों की तू है रागिनीजान-ए-तमन्ना…

हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही किस ने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही दिल के लुटने का सबब पूछो न सब के सामने नाम आएगा तुम्हारा ये कहानी फिर सही नफ़रतों के तीर…

मुझ से आँख मिलाए कौन मैं तेरा आईना हूँ मेरा दिया जलाए कौन मैं तिरा ख़ाली कमरा हूँ तेरे सिवा मुझे पहने कौन मैं तिरे तन का कपड़ा हूँ तू जीवन की भरी गली मैं जंगल का रस्ता हूँ आती…

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफ़िर की तरहसिर्फ़ इक बार मुलाक़ात का मौका दे दे मेरी मंज़िल है कहाँ, मेरा ठिकाना है कहाँसुबह तक तुझसे बिछड़ कर मुझे जाना है कहाँसोचने के लिए इक रात का मौका दे दे अपनी…

वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है सच को मैं ने सच कहा जब कह दिया तो कह दिया अब ज़माने की नज़र में ये हिमाक़त है तो…

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