Celebrating Great Writing

Category: Ghazal

सर-ए-महशर हम ऐसे आसियों का और क्या होगा दर-ए-जन्नत न वा होगा दर-ए-रहमत तो वा होगा जहन्नम हो कि जन्नत जो भी होगा फ़ैसला होगा ये क्या कम है हमारा और उन का सामना होगा अज़ल हो या अबद दोनों…

हर बार हुआ है जो वही तो नहीं होगा डर जिस का सताता है अभी तो नहीं होगा दुनिया को चलो परखें नए दोस्त बनाएँ हर शख़्स ज़माने में वही तो नहीं होगा वो शख़्स बड़ा है तो ग़लत हो…

ज़मीं पे एड़ी रगड़ के पानी निकालता हूँ मैं तिश्नगी के नए मआनी निकालता हूँ वही बरामद करूँगा जो चीज़ काम की है ज़बाँ के बातिन से बे-ज़बानी निकालता हूँ फ़लक पे लिखता हूँ ख़ाक-ए-ख़्वाबीदा के मनाज़िर ज़मीन से रंग-ए-आसमानी…

दिल के दीवार-ओ-दर पे क्या देखा बस तिरा नाम ही लिखा देखा तेरी आँखों में हम ने क्या देखा कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा अपनी सूरत लगी पराई सी जब कभी हम ने आईना देखा हाए अंदाज़ तेरे रुकने का…

एक दिया उस घर जलाएंजहां रहता फौजी रणबांकुरा हो  वो सरहद पर मुस्तैद रहेपर उसके घर हमारा पहरा हो। कुछ दिए अपने हिस्से के जरूरतमंदों को “प्रथमेश” दे आएँउनके घर भी दिवाली का उजियारा हो। एक दिया मेरे मंदिर एक…

इस ख़ाना-ए-हस्ती से गुज़र जाऊँगा बे-लौस साया हूँ फ़क़त नक़्श-ब-दीवार नहीं हूँ अफ़्सुर्दा हूँ इबरत से दवा की नहीं हाजत ग़म का मुझे ये ज़ोफ़ है बीमार नहीं हूँ वो गुल हूँ ख़िज़ाँ ने जिसे बर्बाद किया है उलझूँ किसी…

जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए कि हम से दोस्त बहुत बे-ख़बर हमारे हुए किसे ख़बर वो मोहब्बत थी या रक़ाबत थी बहुत से लोग तुझे देख कर हमारे हुए अब इक हुजूम-ए-शिकस्ता-दिलाँ है साथ अपने जिन्हें…

दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,व्यर्थ है…

जीत की और न हार की ज़िद है दिल को शायद क़रार की ज़िद है कोई भी तो नहीं तआ’क़ुब में जाने किस से फ़रार की ज़िद है हम से कुछ कह रहे हैं सन्नाटे पर हमें इंतिज़ार की ज़िद…

क्या तुम जानते हो पुरुष से भिन्नएक स्त्री का एकांत घर-प्रेम और जाति से अलगएक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीनके बारे में बता सकते हो तुम । बता सकते होसदियों से अपना घर तलाशतीएक बेचैन स्त्री कोउसके घर का पता…

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