Celebrating Great Writing

Category: Farhat Ehsaas

अब तिरी गर्मी-ए-आग़ोश ही तदबीर करे मोम हो कर भी पिघलना नहीं आता है मुझे शाम कर देता है अक्सर कोई ज़ुल्फ़ों वाला वर्ना वो दिन हूँ कि ढलना नहीं आता है मुझे कितने दिल तोड़ चुका हूँ इसी बे-हुनरी…

हमीं थे ऐसे कहाँ के कि अपने घर जाते बड़े-बड़ों ने गुज़ारी है बे-मकानी में ये बे-कनार बदन कौन पार कर पाया बहे चले गए सब लोग इस रवानी में विसाल ओ हिज्र कि एक इक चराग़ थे दोनों सियाह…

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