Celebrating Great Writing

Category: Dr. Rahat Indori

दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान…

सारी बस्ती क़दमों में है, ये भी इक फ़नकारी हैवरना बदन को छोड़ के अपना जो कुछ है सरकारी है कालेज के सब लड़के चुप हैं काग़ज़ की इक नाव लियेचारों तरफ़ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है फूलों…

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