Celebrating Great Writing

Category: Dr. Rahat Indori

पेशानियों पे लिखे मुक़द्दर नहीं मिलेदस्तार कहाँ मिलेंगे जहाँ सर नहीं मिले आवारगी को डूबते सूरज से रब्त हैमग़्रिब के बाद हम भी तो घर पर नहीं मिले कल आईनों का जश्न हुआ था तमाम रातअन्धे तमाशबीनों को पत्थर नहीं…

समन्दरों में मुआफिक हवा चलाता हैजहाज़ खुद नहीं चलते खुदा चलाता है ये जा के मील के पत्थर पे कोई लिख आयेवो हम नहीं हैं, जिन्हें रास्ता चलाता है वो पाँच वक़्त नज़र आता है नमाजों मेंमगर सुना है कि…

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँचीज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो कमर तक पहुँची मैंने पूछा था कि ये हाथ में पत्थर क्यों हैबात जब आगे बढी़ तो मेरे सर तक पहुँची मैं तो सोया था मगर बारहा…

मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं मगर उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूँ मैं अजीब लोग हैं मेरी तलाश में मुझ को वहाँ पे ढूँड रहे हैं जहाँ नहीं हूँ मैं मैं आइनों से…

मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा ये पुल-सिरात अगर है तो चल के देखूँगा सवाल ये है कि रफ़्तार किस की कितनी है मैं आफ़्ताब से आगे निकल के देखूँगा मज़ाक़ अच्छा रहेगा ये चाँद-तारों से मैं आज शाम…

हौसले ज़िंदगी के देखते हैं चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं रोज़ हम इक अँधेरी धुँद के पार क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं धूप इतनी कराहती क्यूँ…

अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ मैं चाहता था चराग़ों को आफ़्ताब करूँ मुझे बुतों से इजाज़त अगर कभी मिल जाए तो शहर-भर के ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है…

सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है हमारे पाँव की मिट्टी ने सर उठाया है हमेशा सर पे रही इक चटान रिश्तों की ये बोझ वो है जिसे उम्र-भर उठाया है मिरी ग़ुलैल के पत्थर का कार-नामा था मगर ये…

काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं हम पे हाकिम का कोई…

एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम…

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