Celebrating Great Writing

Category: Deepti Mishra

बे-हद बेचैनी है लेकिन मक़्सद ज़ाहिर कुछ भी नहींपाना खोना हँसना रोना क्या है आख़िर कुछ भी नहीं अपनी अपनी क़िस्मत सब की अपना अपना हिस्सा हैजिस्म की ख़ातिर लाखों सामाँ रूह की ख़ातिर कुछ भी नहीं उस की बाज़ी…

मैं ने अपना हक़ माँगा था वो नाहक़ ही रूठ गया बस इतनी सी बात हुई थी साथ हमारा छूट गया वो मेरा है आख़िर इक दिन मुझ को मिल ही जाएगा मेरे मन का एक भरम था कब तक…

वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो हैये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है सच को मैं ने सच कहा जब कह दिया तो कह दियाअब ज़माने की नज़र में ये हिमाक़त है तो है कब…

Back to top