Celebrating Great Writing

Category: Alok Shrivastava

हर बार हुआ है जो वही तो नहीं होगा डर जिस का सताता है अभी तो नहीं होगा दुनिया को चलो परखें नए दोस्त बनाएँ हर शख़्स ज़माने में वही तो नहीं होगा वो शख़्स बड़ा है तो ग़लत हो…

मुझे सिरे से पकड़ कर उधेड़ देती है मैं एक झूट वो सच्चे सुबूत जैसी है मैं रोज़ रोज़ तबस्सुम में छुपता फिरता हूँ उदासी है कि मुझे रोज़ ढूँढ लेती है ज़रूर कुछ तो बनाएगी ज़िंदगी मुझ को क़दम…

नज़र आता है डर ही डर, तेरे घर-बार में अम्मा नहीं आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा यहाँ तो कोई भी रिश्ता नहीं विश्वास के क़ाबिलसिसकती हैं मेरी साँसें, बहुत डरता है मेरा दिलसमझ आता नहीं ये क्या छुपा…

तुझे ऐ ज़िंदगी अब आँख भर के देखना है,तेरी बारीकियों को ‘ज़ूम’ कर के देखना है ग़लत इल्ज़ाम कैसे ‘फ़ेस’ करती है हक़ीक़त,ये ख़ुद पर ही कोई इल्ज़ाम धर के देखना है. ज़माने का चलन है~ भावनाएँ ‘कैश’ करना,ज़माने पर…

Back to top