Celebrating Great Writing

Author: shajarekhwab

घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में काँटों पे चले लेकिन होने न दिया ज़ाहिर तलवों का लहू धोया छुप छुप के अकेले में ऐ दावर-ए-महशर ले देख आए तिरी…

सियाने थे मगर इतने नहीं हम ख़मोशी की ज़बाँ समझे नहीं हम अना की बात अब सुनना पड़ेगी वो क्या सोचेगा जो रूठे नहीं हम अधूरी लग रही है जीत उस को उसे हारे हुए लगते नहीं हम हमें तो…

नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता…

सितम के बा’द करम की अदा भी ख़ूब रही जफ़ा तो ख़ैर जफ़ा थी वफ़ा भी ख़ूब रही ब-फ़ैज़-ए-गर्दिश-ए-दौराँ उन्हें भी प्यार आया ब-पास-ए-मस्लहत उन की रज़ा भी ख़ूब रही ब-सद-ख़ुलूस क़नाअ’त की दाद मिलती है गदा-नवाज़ी-ए-अहल-ए-सख़ा भी ख़ूब रही…

तो मैं भी ख़ुश हूँ कोई उस से जा के कह देना अगर वो ख़ुश है मुझे बे-क़रार करते हुए तुम्हें ख़बर ही नहीं है कि कोई टूट गया मोहब्बतों को बहुत पाएदार करते हुए मैं मुस्कुराता हुआ आइने में…

मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ मिरी…

परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है मिला है हुस्न तो इस हुस्न की हिफ़ाज़त कर सँभल के चल तुझे सारा जहान देखता है कनीज़ हो कोई या कोई शाहज़ादी हो जो…

हवेलियों में मिरी तर्बियत नहीं होती तो आज सर पे टपकने को छत नहीं होती हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल उदासियों की कोई शहरियत नहीं होती चराग़ घर का हो महफ़िल का हो कि मंदिर का हवा…

ईद का चांद हो गया है कोईजाने किस देस जा बसा है कोई पूछता हूं मैं सारे रस्तों सेउस के घर का भी रास्ता है कोई एक दिन मैं ख़ुदा से पूछूं गाक्या ग़रीबों का भी ख़ुदा है कोई इक…

दिल कब ख़याल-ए-यार से ख़ाली रहा मिरामुझमें वजूद ही कहाँ बाक़ी रहा मिरा मुम्किन है मुस्कुराने से तस्कीन कुछ मिलेरोने का तजरबा तो बुरा ही रहा मिरा बस आईने की आँख में देखी कभी न दाददुनिया में वैसे नाम तो…

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